अर्थ

कर्पूरगौरं मन्त्र का अर्थ: शब्द-दर-शब्द व्याख्या

प्रकाशित 2 मिनट SpiritualMarg

कर्पूरगौरं मन्त्र हिन्दू घरों की सबसे परिचित छोटी प्रार्थनाओं में से एक है। आरती के अन्त में, कपूर जलाते समय इसे बोला जाता है। पूरा पाठ हमारे कर्पूरगौरं पृष्ठ पर है। यहाँ इसका अर्थ समझें।

श्लोक

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

शब्दार्थ

सरल अर्थ

जो कपूर के समान गौर हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं, सर्पराज को हार रूप में धारण करते हैं और भवानी सहित सदा मेरे हृदय-कमल में बसते हैं, उन शिवजी को मैं प्रणाम करता/करती हूँ।

आरती के बाद क्यों?

कपूर बिना राख छोड़े पूरा जल जाता है, इसलिए इसे अहंकार के पूर्ण विलय का प्रतीक माना जाता है। श्लोक में कपूर का उल्लेख इसे स्वाभाविक समापन प्रार्थना बनाता है। ॐ जय शिव ओंकारा के बाद यह विशेष रूप से उपयुक्त है।

उच्चारण के सुझाव

पूजा में कैसे शामिल करें

आरती के बाद मन्त्र बोलें, कपूर की लौ एक बार घुमाएँ, फिर हथेलियों से लौ का ताप लेकर आँखों से लगाएँ। विधि के लिए देखें घर पर आरती कैसे करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आरती के बाद कर्पूरगौरं क्यों बोला जाता है?

यह शिवजी की छोटी प्रार्थना है जो कपूर जलाते समय पूजा के समापन पर आशीर्वाद के रूप में बोली जाती है।

कर्पूरगौरं मन्त्र किसने लिखा?

यह एक परम्परागत संस्कृत श्लोक है जो शिव पूजा से जुड़ा है। इसके रचयिता की निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है।

क्या यह केवल शिव भक्तों के लिए है?

नहीं। बहुत से परिवार इसे किसी भी आरती के अन्त में सामान्य समापन प्रार्थना की तरह बोलते हैं।

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