कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र
बोल सबसे प्रचलित रूप में दिए गए हैं। क्षेत्र अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।
कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र का अर्थ
कर्पूरगौरं: कपूर के समान गौर और शुद्ध। करुणावतारं: करुणा के साक्षात अवतार। संसारसारं: समस्त संसार के सार। भुजगेन्द्रहारम्: जो सर्पराज को हार के रूप में धारण करते हैं।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे: जो सदा हृदय रूपी कमल में निवास करते हैं। भवं भवानीसहितं नमामि: उन भव (शिव) को भवानी सहित मैं नमन करता हूँ।
कपूर पूरी तरह जलकर कोई अवशेष नहीं छोड़ता, वैसे ही भक्ति में अहंकार मिट जाना चाहिए। इसीलिए कपूर आरती के समय यह श्लोक बोला जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आरती के बाद कर्पूरगौरं क्यों बोलते हैं?
यह शिव-पार्वती को नमन के साथ आरती पूर्ण करता है, और कपूर जलाते समय अहंकार के पूर्ण विलय का प्रतीक है।
यह श्लोक कहाँ से आया?
यह पारम्परिक संस्कृत श्लोक है। लोक मान्यता है कि शिव-पार्वती विवाह के समय भगवान विष्णु ने इसे गाया था।
इसे कितनी बार बोलें?
आरती के अंत में एक बार बोलना सामान्य है; कुछ लोग तीन बार बोलते हैं।